"वो अपना यार"- "कविता" - BY SHIVANKIT TIWARI "SHIVA"

दिल बहुत बेचैन है, क्यों इतना बेकरार है।
यादों में हर वक्त मेरे गाँव का वह यार है।

नज़र से हटता नहीं, हरदम बुलाता बार-बार, 
जैसे मेरी जिंदगी है वह, मेरा संसार है।

है कभी बचपन गुजारा मैंने उनके साथ-साथ,
मेरी मौजों का समंदर उसके आर-पार है। 

खेत-खलिहानों में वह, अमराइयों में रह गया, 
मैं अकेला हूं इधर, वह आज भी गुलज़ार है।

एक बरगद था, जहां हर दोपहर की मस्तियां
छांव में घुलती थीं, उनकी अब कहां दरकार है। 

रूठ जाता था मैं उससे, वह मनाता था मुझे,
वह हंसी का कारवां अब हो चुका दुश्वार है। 

©शिवांकित तिवारी "शिवा"
  -युवा कवि एवं लेखक 




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