"लोग"- "कविता"-BY - SHIVANKIT TIWARI "SHIVA"
लोग जहर उगलते हैं,रोज चेहरे बदलते हैं,
सच के बने सभी किरदार हैं जो,
झूठ और फरेब पे सवार होकर चलते हैं,
बबन्डर नफरतों का जेहन में बरकरार हैं जिनके,
बातें वो सारी प्यार-मोहब्बत की करते हैं,
किसी की कामयाबी की खुशी में,शरीक होने वाले लोग,
उसकी कामयाबी के चर्चो से भी जलते हैं,
दुआ करते हैं की सदा सलामत रहें तू,
जिनके दिलों में हमारे लिये नफरतों के बीज पलते हैं,
हर कदम पे साथ निभाने का वादा करते थे कभी जो,
वक्त आने पर वो न घर से बाहर निकलते हैं,
बहुत विश्वास था जिनपे कभी भी न छलेगें ये,
वही विश्वास तोड़ के हमें हर बार छलते हैं,
अब न भरोसे का कोई इन्सान है साहब,
भरोसा तोड़ यहाँ इंसा को इंसा ठगतें हैं,
सापों का जहर शामिल हैं यहाँ लोगों में,
हर बार विष भरकर यहाँ इन्सान डसते है,
बहुत चालाकियां सीख ली हमने भी यहाँ लोगों से,
जहर में डूबे किरदारों के जाल में अब हम न फसतें हैं,
-शिवांकित तिवारी "शिवा"
युवा कवि एवं लेखक

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